हिंदुत्ववादी अर्थव्यवस्था में

हिंदुओं को क्या लाभ?

- शमीक लाहिड़ी

बाज़ार जाने पर जेब खाली होने लगती है, रसोई गैस की कीमत सुनकर झटका लगता है, और शिक्षित बेटे को नौकरी के लिए चातक पक्षी की तरह इंतज़ार करना पड़ता है—आज के भारत के करोड़ों मध्यमवर्ग, निम्नवर्ग और गरीब लोगों की यही रोज़मर्रा की कड़वी हकीकत है। इसके बावजूद, अजीब बात यह है कि आम जनता की बचत दिन-ब-दिन शून्य होती जा रही है, और उनकी आँखों के सामने ही देश के दो-तीन उद्योगपतियों की संपत्ति रॉकेट की गति से बढ़ रही है। ऊपरी तौर पर इस शासन व्यवस्था में 'आत्मनिर्भरता', 'विकास' और 'राष्ट्रीय गौरव' के भव्य विज्ञापनों का मुलम्मा चढ़ा हुआ है। लेकिन उन आकर्षक नारों की आड़ में दरअसल एक ऐसा सुनियोजित आर्थिक खेल चल रहा है, जो देश के बहुसंख्यक आम लोगों को लगातार हाशिए पर धकेल रहा है और देश के जल, जंगल, ज़मीन और भारी संपत्ति को महज़ मुट्ठी भर कॉर्पोरेट धनकुबेरों के हाथों में सौंप रहा है। समकालीन शब्दावली में इस विशेष मॉडल को ही कई लोग धार्मिक राजनीति की आड़ में फल-फूल रहा 'लुटेरा पूंजीवाद' (क्रोनी कैपिटलिज्म) का राज कह रहे हैं।

हिंदुत्ववादी अर्थव्यवस्था, जिसे समकालीन राजनीतिक और आर्थिक बहसों में अक्सर लुटेरे पूँजीवाद (Crony Capitalism) और नव-उदारवाद (Neo-liberalism) के एक विशेष रूप के तौर पर देखा जाता है, ने पिछले एक या डेढ़ दशक में भारत के आर्थिक ढांचे को गहराई से प्रभावित किया है। ऊपरी तौर पर भले ही इस आर्थिक दर्शन में 'आत्मनिर्भरता', 'विकास' और 'उग्र राष्ट्रवादी गौरव' के नारे दिए जाते हों, लेकिन इसके भीतर की ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है। विभिन्न आंकड़ों और आर्थिक सर्वेक्षणों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इस मॉडल ने मूल रूप से देश के अधिकांश गरीब और मध्यमवर्गीय लोगों को लाचार कर दिया है और मुट्ठी भर कॉर्पोरेट पूँजीपतियों के हाथों में देश की अकूत संपत्ति को केंद्रित कर दिया है।

नारे बनाम हकीकत

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य उद्देश्य समान वितरण और आम लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना होना चाहिए। लेकिन पिछले एक दशक में भारत में हिंदुत्ववादी राजनीतिक दर्शन के समानांतर जो विशेष आर्थिक मॉडल विकसित हुआ है, वह मूल रूप से 'राष्ट्रवादी भावनाओं और पूँजीपतियों के हितों की एक जुगलबंदी' है। एक तरफ राम मंदिर, उग्र राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पुनरुत्थान की भावनाओं में आम जनता को उलझाकर रखा जा रहा है; दूसरी तरफ पर्दे के पीछे देश की संपत्तियों और नीतियों को इस तरह संचालित किया जा रहा है जिससे केवल कुछ बेहद अमीर कॉर्पोरेट समूहों को ही फायदा हो। इसके प्रत्यक्ष शिकार देश के किसान, मजदूर, निम्नवर्ग और वेतनभोगी मध्यमवर्ग के लोग हो रहे हैं।

संपत्ति का अत्यधिक असमान वितरण

हिंदुत्ववादी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी नाकामी संपत्ति का भयंकर असमान वितरण है। अंतर्राष्ट्रीय संस्था ऑक्सफैम (Oxfam) और थॉमस पिकेटी की 'वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब' (World Inequality Lab) की हालिया रिपोर्टें भारत की इस भयावह तस्वीर को सामने लाती हैं।

शीर्ष 1 % का कब्ज़ा: साल 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, भारत के शीर्ष 1 प्रतिशत अमीरों के पास देश की कुल संपत्ति का 40 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा केंद्रित है। यह ब्रिटिश काल के असमानता के रिकॉर्ड को भी पार कर गया है। इसके विपरीत, आर्थिक रूप से निचले पायदान पर मौजूद 50 प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का महज़ 6 प्रतिशत या उससे भी कम हिस्सा है।

साल 2014 में भारत में जहाँ बिलियनेयर्स (100 करोड़ अमेरिकी डॉलर वाले अमीर) की संख्या 109 थी, वहीं वर्तमान में यह बढ़कर 308 हो गई है। कोविड के समय, जब देश के करोड़ों लोगों ने अपने रोजगार और आय खो दिए थे, तब भारत के इन अरबपतियों की कुल संपत्ति 23.14 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 53.16 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गई। Oxfam की रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान उनकी संपत्ति प्रतिदिन औसतन लगभग 3,600 करोड़ रुपये की दर से बढ़ी।

कोविड-19 महामारी के दौरान Oxfam के आंकड़ों के अनुसार, मुकेश अंबानी की संपत्ति बढ़ने की दर प्रतिदिन लगभग 2,000 करोड़ रुपये से अधिक थी। वहीं ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स (Bloomberg Billionaires Index) का हवाला देते हुए Oxfam ने उल्लेख किया कि 2021 में गौतम अडानी की संपत्ति में अनुमानित 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक की वृद्धि हुई थी, जिसका दैनिक औसत लगभग 800 से 1,000 करोड़ रुपये था।

ये सारे आंकड़े साबित करते हैं कि इस अर्थव्यवस्था में जो भी आर्थिक विकास (Growth) हो रहा है, उसका थोड़ा सा हिस्सा भी रिसकर (Trickle-down) नीचे के तबके के लोगों तक नहीं पहुँच रहा है। संपत्ति ऊपरी स्तर पर ही रुकी हुई है और आम लोगों की जेबों से ही इसे लूटा जा रहा है।

लुटेरा पूँजीवाद और मुट्ठी भर लोगों का राज

हिंदुत्ववादी अर्थव्यवस्था की मुख्य चालक शक्ति सरकार के संरक्षण में पनप रहा एकाधिकारवादी पूँजीवाद है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, गिने-चुने उद्योग समूह (Conglomerate Capitalism) पूरे देश की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित कर रहे हैं। अर्थशास्त्र में 'कॉन्गलोमरेट' का मतलब एक ऐसी विशाल कॉर्पोरेट संस्था से होता है, जो एक साथ कई तरह के अलग-अलग व्यवसायों को नियंत्रित करती है। जब किसी देश की अर्थव्यवस्था में ऐसे दो-तीन विशाल बहुमुखी कॉर्पोरेट समूह पूरे बाज़ार और सरकारी नीतियों को नियंत्रित करने लगते हैं, तो उस व्यवस्था को 'कॉन्गलोमरेट कैपिटलिज्म' कहा जाता है; जैसा कि हमारे देश में अंबानी या अडानी समूह कर रहे हैं।

भारत के हवाई अड्डे, बंदरगाह, कोयला खदानें, बिजली घर, ग्रीन एनर्जी और टेलीकॉम सेक्टर का बड़ा हिस्सा अब केवल दो या तीन बड़े कॉर्पोरेट घरानों, विशेषकर अडानी और अंबानी ग्रुप के नियंत्रण में है।

पिछले एक दशक में गौतम अडानी के नेतृत्व में अडानी ग्रुप भारत के बंदरगाहों, हवाई अड्डों, बिजली और ऊर्जा क्षेत्र के सबसे बड़े नियंत्रक के रूप में उभरा है।

(क)निजीकरण के बाद अडानी ग्रुप रातों-रात देश की सबसे बड़ी निजी हवाई अड्डा संचालक कंपनी बन गया है। भारत के कुल हवाई अड्डा यात्री परिवहन का लगभग 23 % से 25 % और हवाई माल ढुलाई (Air Cargo) का लगभग 33% 'अडानी एयरपोर्ट्स' के नियंत्रण में है। मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे (देश का दूसरा सबसे बड़ा हवाई अड्डा) के साथ-साथ अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर, गुवाहाटी, तिरुवनंतपुरम और मैंगलोर हवाई अड्डों के 100% संचालन और विकास की जिम्मेदारी इन्हीं के हाथों में है।

(ख) भारत के समुद्री व्यापार के प्रवेश द्वार अब मुख्य रूप से 'अडानी पोर्ट्स' (APSEZ) के नियंत्रण में हैं। भारत की कुल वाणिज्यिक बंदरगाह क्षमता (Port Capacity) का लगभग 24-25% हिस्सा अकेले अडानी ग्रुप के पास है। ' भारत का सबसे बड़ा निजी बंदरगाह गुजरात का 'मुद्रा ',ओडिशा का धामरा, आंध्र प्रदेश का कृष्णपट्टनम, तमिलनाडु का कट्टुपल्ली, केरल का विझिंजम अंतर्राष्ट्रीय गहरे समुद्र का बंदरगाह समेत कुल 13 महत्वपूर्ण बंदरगाह अकेले यह ग्रुप नियंत्रित करता है।

(ग) निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी ताप विद्युत (Thermal Power) उत्पादक कंपनी 'अडानी पावर' है, जिसकी उत्पादन क्षमता 15,250 मेगावाट (MW) है। भारत के कोयला आयात का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी ग्रुप के ज़रिए होता है। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ और ओडिशा की कई बड़ी सरकारी कोयला खदानों के 'माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर' (MDO) के रूप में अडानी ग्रुप खनन के काम को पूरी तरह से नियंत्रित करता है।

(घ)अडानी ग्रीन एनर्जी' (AGEL) भारत की सबसे बड़ी नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादक कंपनियों में से एक है। राजस्थान के खाटू में वे 20,000 मेगावाट क्षमता का दुनिया का सबसे बड़ा रिन्यूएबल एनर्जी पार्क बना रहे हैं। 2030 तक उनका लक्ष्य 45,000 मेगावाट ग्रीन एनर्जी उत्पादन का है।

मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज ग्रुप ने मुख्य रूप से भारत के टेलीकॉम, रिटेल (खुदरा बाज़ार) और तेल रिफाइनरी क्षेत्र पर अपना पूर्ण नियंत्रण बना रखा है।

(क)2016 में जियो (JIO)के आने के बाद भारत के टेलीकॉम सेक्टर का चेहरा ही बदल गया। तीव्र प्रतियोगिता के कारण वोडाफोन-आइडिया लगभग डूबने के कगार पर हैं और एयरटेल दूसरे स्थान पर खिसक गया है। भारत के टेलीकॉम बाज़ार के लगभग 45% ग्राहक अकेले जियो के पास हैं। देश के 4G और 5G डेटा ट्रैफिक का अधिकांश हिस्सा जियो के नेटवर्क पर ही निर्भर है। इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं के क्षेत्र में इस समूह का भारी एकाधिकार है। वहीं, सरकार ने पिछले 2 दशकों से सरकारी टेलीकॉम कंपनी बीएसएनएल (BSNL) को लगभग मार डाला है, ताकि अंबानी का व्यवसाय बिना किसी प्रतियोगिता के पूरे बाज़ार पर कब्ज़ा कर सके।

(क) गुजरात के जामनगर में स्थित रिलायंस की तेल रिफाइनरी दुनिया की सबसे बड़ी सिंगल-लोकेशन रिफाइनरी है, जिसकी उत्पादन क्षमता 1.24 मिलियन बैरल (लगभग 19.71 करोड़ लीटर) प्रतिदिन है। भारत के पेट्रोकेमिकल्स बाज़ार और पॉलीमर व पॉलिस्टर उत्पादन के एक बड़े हिस्से पर रिलायंस का नियंत्रण है।

(ग) टेलीकॉम के साथ-साथ अंबानी ग्रुप भारत के संगठित खुदरा बाज़ार में भी नंबर वन शक्ति है। 'रिलायंस रिटेल' के छत्र तले देश की सबसे बड़ी रिटेल चेन जैसे—रिलायंस फ्रेश, डिजिटल, ट्रेंड्स आदि शामिल हैं। देश भर में इनके 18,000 से अधिक स्टोर्स हैं और देश के संगठित खुदरा बाज़ार का एक बड़ा हिस्सा इनके नियंत्रण में है।

३. भविष्य के सबसे मुनाफे वाले क्षेत्र, यानी ग्रीन हाइड्रोजन और क्लीन एनर्जी के बाज़ार पर भी ये दोनों ग्रुप भारत के बड़े हिस्से को अपने कब्जे में कर रहे हैं। 2030 तक इस क्षेत्र में अडानी और रिलायंस ने संयुक्त रूप से लगभग 100 बिलियन डॉलर (लगभग 9.6 लाख करोड़ रुपये) के निवेश की घोषणा की है। ऐसे में देश के ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के लक्ष्य का बड़ा हिस्सा इन्हीं दो कंपनियों के कारखानों से आएगा।

४- मीडिया और मनोरंजन (Media & Entertainment)भारत में सूचना के स्रोत या मीडिया जगत पर भी इन्हीं दो धनकुबेर समूहों का नियंत्रण है। रिलायंस के पास 'नेटवर्क 18' है और हाल ही में डिज़नी-स्टार के साथ उनके मेगा-मर्जर के बाद भारत के टीवी और ओटीटी (OTT) बाज़ार का लगभग 40-50% हिस्सा उनके कब्ज़े में आ गया है। दूसरी तरफ, अडानी ग्रुप ने 'एनडीटीवी' (NDTV) और 'बीडब्लियू क्यू' का अधिग्रहण करके समाचार माध्यमों पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया है।

अर्थशास्त्री इसी व्यवस्था को 'डूओपोली' (Duopoly) या दो समूहों का एकाधिकार कह रहे हैं। जब किसी देश के हवाई अड्डे से कौन सफर करेगा, किस बंदरगाह से सामान आयात होगा, घरों में कौन सी बिजली जलेगी, फोन पर कौन सा नेटवर्क चलेगा, टीवी या मोबाइल पर लोग क्या खबरें देखेंगे और रसोई में किस ब्रांड का तेल-आटा इस्तेमाल होगा—यह सब कुछ घूम-फिरकर सिर्फ दो कॉर्पोरेट बोर्डों के फैसलों से तय होने लगे, तब देश के आम लोगों की आज़ादी और छोटे व्यापारियों के जीवित रहने के साधन बेहद खतरे में पड़ जाते हैं। ये आंकड़े ही इस बात का पुख्ता सबूत हैं कि भारत की संपत्ति आज किस तरह मुट्ठी भर लोगों के हाथों में सिमट कर रह गई है।

(जारी)

साभार:- देशहितैषी

(लेखक सी पी आई (एम) की केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं)