भारत के संविधान में हर किसी को अपनी आस्था और विचारधारा के अनुसार जीने का अधिकार है। राज्य स्तर पर और एक ही राज्य के विभिन्न समुदायों के बीच कई तरह की परंपराएं, त्योहार, लोकचार और शास्त्रचार हैं, जिनका अपना ऐतिहासिक संदर्भ है। इसके साथ कुछ देशज परंपराएं भी हैं। जो लोग धर्म आधारित फासीवादी राजनीति करते हैं, वे अपनी सोच को दूसरों पर थोपना चाहते हैं, जो लोकतंत्र के पूरी तरह खिलाफ है। हमारे देश में कोई शाकाहारी है तो कोई मांसाहारी; हमारी एक मिश्रित संस्कृति है। इस विविधता को स्वीकार करना ही लोकतंत्र की नींव है, लेकिन बीजेपी इसे तोड़ना चाहती है। इसके खिलाफ हम उन सभी विचारशील लोगों को एकजुट करने का प्रयास कर रहे हैं जो सवाल पूछने की हिम्मत रखते हैं और लोकतांत्रिक भावना से विरोध में खड़े होना चाहते हैं। यदि व्यापक वामपंथी एकता और उसके दायरे को नहीं बढ़ाया गया, तो हम पर चारों तरफ से हो रहे हमलों का मुकाबला नहीं किया जा सकेगा। गुंडों, पुलिस-प्रशासन और कानूनों के नए-नए रूपों के जरिए हमले हो रहे हैं—लेनिन, नेताजी, राहुल सांकृत्यायन, कोई भी इससे अछूता नहीं है।
मोहम्मद सलीम
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव