वर्ष 2026 के मुज़फ़्फ़र अहमद स्मृति पुरस्कार के लिए केरल के इतिहासकार के. एन. गणेश और इटाहार कॉलेज के बांग्ला विभागाध्यक्ष आइरीन शबनम द्वारा लिखी गई दो पुस्तकों को चुना गया है। आगामी 5 अगस्त को मुज़फ़्फ़र अहमद के 138 वें जन्मदिन पर आयोजित कार्यक्रम में उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा।
मुज़फ़्फ़र अहमद पुरस्कार घोषित
विशेष प्रतिनिधि: कोलकाता, 31 जुलाई— वर्ष 2026 के मुज़फ़्फ़र अहमद स्मृति पुरस्कार के लिए केरल के इतिहासकार के. एन. गणेश और इटाहार कॉलेज के बांग्ला विभागाध्यक्ष आइरीन शबनम द्वारा लिखी गई दो पुस्तकों को चुना गया है। आगामी 5 अगस्त को मुज़फ़्फ़र अहमद की 138 वें जन्मदिन पर आयोजित कार्यक्रम में उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा।
इस वर्ष के पुरस्कार के लिए के. एन. गणेश की 'लेफ़्टवर्ड' द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'द डायलेक्टिक ऑफ़ हिस्ट्री: ए स्टडी ऑफ़ नेचर एंड सोशल प्रोसेस' और आइरीन शबनम की 'एकूश शतकेर' द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'बांगाली मुसलमान: संस्कृतिर संकट' का चयन किया गया है।
मुज़फ़्फ़र अहमद स्मृति पुरस्कार समिति के अध्यक्ष श्रीदीप भट्टाचार्य ने बताया कि हर वर्ष समाज की प्रगति के उद्देश्य से लिखी गई पुस्तकों में से ही इस पुरस्कार के लिए पुस्तकों का चयन किया जाता है। इस वर्ष भी बांग्ला और अंग्रेज़ी भाषा की कई उत्कृष्ट पुस्तकें पुरस्कार समिति के पास आई थीं। हमने इस बार 'केरल काउंसिल ऑफ़ हिस्टोरिकल रिसर्च' के सदस्य के. एन. गणेश द्वारा लिखित पुस्तक और इटाहार कॉलेज की बांग्ला विभागाध्यक्ष आइरीन शबनम की पुस्तक का चयन किया है। ये दोनों पुस्तकें वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक और अवश्य पठनीय मानी गई हैं।
'द डायलेक्टिक ऑफ़ हिस्ट्री: ए STUDY ऑफ़ नेचर एंड सोशल प्रोसेस' पुस्तक के सम्बंध में श्रीदीप भट्टाचार्य ने कहा कि लेखक ने इस पुस्तक में मार्क्सवाद द्वारा उठाए गए कुछ बुनियादी प्रश्नों पर चर्चा की है। इसमें उनके लम्बे समय के गहन चिंतन की झलक मिलती है, जो पाठकों का ध्यान आकर्षित करती है। लेखक ने विज्ञान के अध्ययन में विकासक्रम, मानव सभ्यता के शुरुआती इतिहास, मानव प्रवास, सभ्यता के मार्ग और बुद्धि के विकास जैसे विषयों पर नवीनतम प्रगति के आलोक में एक निरंतर व्याख्या प्रस्तुत की है। उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान और समाजशास्त्र के गहरे प्रयोग की कुशलता दिखाई है। 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के बाद से मार्क्सवाद के अध्ययन और चर्चा में तेज़ी आई है। यह पुस्तक आज के समय में उत्पन्न समस्याओं के समाधान और मानव समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन की समझ को ध्यान में रखकर लिखी गई है। यह मार्क्सवादी सिद्धांत के अध्ययन के भंडार में एक महत्वपूर्ण योगदान है।
आइरीन शबनम की पुस्तक भी वर्तमान समय में बेहद प्रासंगिक है और प्रगतिशील पाठकों के लिए एक अनिवार्य पाठ्य सामग्री है। स्वयं की तलाश की इस प्रक्रिया में उन्होंने इन प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास किया है:क्या बंगाल के मुसलमान बंगाली नहीं हैं ? क्या उनकी मातृभाषा बांग्ला नहीं है? क्या इस देश की परंपरा और संस्कृति भारतीय मुसलमानों की संस्कृति नहीं है? क्या अरब और ईरान की संस्कृति ही उनकी संस्कृति है?क्या बंगाल के गौरवशाली पुनर्जागरण में बंगाली मुसलमान शामिल नहीं थे? और यदि नहीं थे, तो क्यों नहीं थे?
बंगाली मुसलमानों को पाश्चात्य (पश्चिमी) शिक्षा अपनाने में देर क्यों हुई, और हिंदुओं की तरह उनके बीच एक मध्यम वर्ग क्यों नहीं उभर सका?
उन्होंने एक तर्कसंगत और भौतिकवादी दृष्टिकोण से इन पहलुओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया है, जो आज के भारत और बंगाल के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है।
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साभार: बांग्ला दैनिक 'गणशक्ति' | 1 अगस्त, 2026
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