जब बेतहाशा बिकने लगे
या बेचा जाने लगे
तब मरने लगता है
उसके होने का मर्म
जन समाचार मंच
जब बेतहाशा बिकने लगे
या बेचा जाने लगे
तब मरने लगता है
उसके होने का मर्म

धर्म
जब बेतरह दिखने लगे
या दिखाया जाने लगे
तब वह खोने लगता है
अपने होने का अर्थ
धर्म
जब बेतहाशा बिकने लगे
या बेचा जाने लगे
तब मरने लगता है
उसके होने का मर्म
धर्म
जब पसरने लगे
या पसराया जाने लगे
महामारी की तरह
तब फर्क मिट जाता है
धर्म और अधर्म का
धर्म
जब ज़िंदगी में
सबसे ज़रूरी हो जाए
तब शुरुआत होती है
ज़िंदगी के ख़त्म होने की
ज़िंदगियां ख़त्म होने की
यह सब
तब शुरू हुआ
वत्स युधिष्ठिर!
जब
हम सबने मिलकर
धर्म की हत्या की
और उसकी जगह
अधर्म को स्थापित किया
यह जो चारों ओर
धर्म का शोर
तुम्हें सुनाई दे रहा है
यह अधर्मी पापियों का
अट्टहास है
धर्म की हत्या के बाद
हर युग में
ईश्वर मर जाता है
और मर जाती हैं
सारी संभावनाएं
जीवन की
यह सब
धर्म के नाम पर
हम सबने किया
तो दंड भी
हम सभी को वहन करना है
मनुष्य
अपने कर्मफल का
उत्तरदाई होता है
धर्मराज!
- हूबनाथ
[लेखक परिचय: लगभग 20 पुस्तकों के अनुवाद एवं संपादन का काम कर चुके लेखक हूबनाथ 'बाजा', 'हमारी बेटी' और 'अंतर्ध्वनि' फिल्मों में संवाद लेखन कर चुके है। आपकी 'कौए', 'लोअर परेल', 'अकाल' व 'मिट्टी' नाम से काव्य संग्रह सहित 'ललित निबंध', 'सिनेमा समाज साहित्य' समेत अनेक किताबें प्रकाशित है। आप मुंबई में रहते है।]
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अपलोडर: VKA-N9LYCE • प्रकाशित: 26 जुलाई 2026 • 2 मिनट पठन

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने स्पष्टत: कहा कि राममोहन राय ने भारत में आधुनिक युग का उद्घाटन किया, आज के विश्वजनीन सहयोग के जमाने की मानवता में हमारी दीक्षा उन्होंने ही सम्पन्न किया।
श्रेया जायसवाल • 22 मई 2026

भक्ति-आन्दोलन का जनसाधारण पर जितना व्यापक प्रभाव हुआ उतना किसी अन्य आन्दोलन का नहीं। पहली बार शूद्रों ने अपने सन्त पैदा किये, अपना साहित्य और अपने गीत सृजित किये। कबीर, रैदास, नाभा सिपी, सेना नाई, आदि-आदि महापुरुषों ने ईश्वर के नाम पर जातिवाद के विरुद्ध आवाज बुलन्द की। समाज के न्यस्त स्वार्थवादी वर्ग के विरुद्ध नया विचारवाद अवश्यम्भावी था , वह हुआ।
अपराजिता • 30 जुलाई 2026

राममोहन के युग में पूरी दुनिया में वे एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने आधुनिक युग के वास्तविक अर्थ को पूर्ण रूप से समझा था। वे जानते थे कि अलग-अलग संकीर्ण स्वतंत्रता मानव-साधना का उद्देश्य नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत और राष्ट्रीय स्तर पर सार्वभौमिक पारस्परिक निर्भरता और बंधुत्व में ही मानव-सभ्यता की सार्थकता है। अपने अगाध ज्ञान और सहज अंतर्दृष्टि के बल पर उन्होंने मानवता के इस आदर्श को समाज, साहित्य और धर्म के क्षेत्र में संचारित किया।
श्रेया जायसवाल • 22 मई 2026
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