डिवाइडर पर बैठकर एक लड़की भगत सिंह को पढ़ रही थी। उसकी आंखों और चेहरे पर उत्साह था। सिर्फ रटना नहीं, वह भगत सिंह के लिखे के मायने समझाना चाह रही थी। रात में तब भी कानों में नारे गूँज रहे थे— 'इंकलाब जिंदाबाद', 'जय भीम', 'वंदे मातरम'।
जन समाचार मंच
डिवाइडर पर बैठकर एक लड़की भगत सिंह को पढ़ रही थी। उसकी आंखों और चेहरे पर उत्साह था। सिर्फ रटना नहीं, वह भगत सिंह के लिखे के मायने समझाना चाह रही थी। रात में तब भी कानों में नारे गूँज रहे थे— 'इंकलाब जिंदाबाद', 'जय भीम', 'वंदे मातरम'।

इन कुछ दिनों में दिल्ली के जंतर-मंतर ने कई दृश्यों को जन्म दिया है। जन्म दिया है प्यार को।
और वह दर्द से ही उपजा है। और वही दर्द जब बोलने लगता है, तो उसका नाम 'विद्रोह' हो जाता है। दिल्ली का जंतर-मंतर पिछले 36 दिनों से उसी विद्रोह का तीर्थ बना हुआ था। नीट (NEET) परीक्षा में पेपर लीक और भ्रष्टाचार के खिलाफ जब देश भर के छात्र-छात्राएं सड़कों पर उतरे, तो वहां मानवता का एक अभूतपूर्व संगम देखने को मिला। मध्य प्रदेश से मणिपुर, ट्रांस से ट्राइबल, छात्रों से लेकर महिला पहलवानों तक—सभी के दर्द और आक्रोश के ज्वालामुखी बनने का यह गवाह बना।
पुणे के एक युवा ने बताया कि वह पोस्ट ग्रेजुएट है और एक रेस्टोरेंट में काम करता है। उसने सरकारी नौकरी की उम्मीद छोड़ दी है। रेस्टोरेंट से कुछ दिनों की छुट्टी मांगी तो नहीं मिली, इसलिए नौकरी छोड़कर ही आंदोलन में शामिल होने आ गया। उसने कहा कि उसके दोस्त आने वाले थे पर नहीं आए, लेकिन इस जंतर-मंतर पर आकर उसे नए लोग मिल गए हैं। उससे एक कॉमरेड ने पूछा, "तुम कहाँ ठहरोगे?" जवाब में उसने कहा, "सीपीएम, सीपीआई के लोग सुरजीत भवन और भूपेश भवन में रहने का इंतज़ाम कर रहे हैं, वहीं रह रहा हूँ।" फिर बातों-बातों में उसने बताया कि वामपंथी राजनीति के बारे में उसे पहले कुछ नहीं मालूम था। "लेकिन मैं यहां से सीखना चाहता हूँ।" यह एक वाक्य ही जैसे पूरे आंदोलन से बनने वाली भविष्य की प्रेरक शक्ति बन रहा है।
यह आंदोलन अपरूपा का भी है। लड़कियों ने खुद को सुरक्षित महसूस किया। ट्रांसजेंडर लोगों ने अपनी पहचान छिपाए बिना मुखर होकर नारे लगाए। पुरुष प्रदर्शनकारियों ने पहरा दिया, बुजुर्गों के लिए जगह बनाई। भीषण गर्मी में कोई हाथ में पंखा लिए घूम रहा है, कोई लाइन व्यवस्थित कर रहा है, तो कोई पानी बाँटकर थकावट दूर कर रहा है। मंच से बार-बार एक ही बात कही जा रही है, "ये स्वयंसेवक ही असली चैम्पियन हैं।" व्यक्ति नहीं, यहाँ 'टीम वर्क' निखर कर सामने आया है। इसलिए जंतर-मंतर के मैदान में सिर्फ विरोध नहीं, कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि मानवता का पाठ देखने को मिला।
कहीं चंडीगढ़ से नामी आईटी कम्पनी का एक कर्मचारी झाड़ू लगा रहा है, तो बगल में ही दिल्ली के हिंदू कॉलेज की रुखसाना झाड़ू लगा रही है। पचास की उम्र के एक सज्जन कह रहे हैं, "देश हमारा है, सफ़ाई हम लोगों को ही करनी पड़ेगी।" अधेड़ उम्र की एक महिला खाना बाँट रही थी। कोई लेने से मना करता तो कहती, "क्रांति में 'ना' नहीं होता बेटा।" कई बच्चे अपने अभिभावकों के साथ आए थे। पूछने पर उनके माता-पिता ने कहा कि वे बच्चों को यह सिखाने लाए हैं कि दूसरों के दुख में कैसे साथ खड़े हुआ जाता है। देश का भविष्य यही हैं। गुरुद्वारे से निहंग सिख हाथों में हथियार लिए पहरा देने के साथ-साथ भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं। फ़ैज़ टोपी पहने इम्तियाज साहब उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात से आए आंदोलनकारियों को फल बाँट रहे हैं। स्टाइलिश हेयरकट वाले कूल 'जेन-जी' (Gen-Z) युवा केरल से आए उस कॉमरेड के साथ खाना बाँटकर खा रहे हैं जो लंबे समय से आंदोलनों की आँच में तप चुके हैं। ऐसी कई तस्वीरें जंतर-मंतर से फैलते हुए करनॉट प्लेस और संसद भवन तक दिखाई दीं।
आंदोलन के साथ आकर खड़े हुए हैं सिलीगुड़ी से रत्ना दी, मधुमिता दी; मालदा से प्रवासी मजदूर दिनेश; दिनाजपुर से इस्माइल; कोलकाता से सुप्रतीक और मुंबई से किंजल। हर किसी के शरीर पर अलग पसीना है, लेकिन सपना एक ही है।
मंच पर कई तस्वीरें टंगी थीं। इक्कीस चेहरे। इक्कीस आत्महत्याएं। नीट के परिणाम से सपना टूटने वाले वे इक्कीस छात्र। उनके परिवारों के कुछ लोग इस आंदोलन में आए थे। आँसू रोककर उन्होंने कहा था, "हमारे बच्चे अब नहीं रहे, लेकिन उनके सपनों का कत्ल न किया जाए।" सुनकर कलेजा फट जाता है।
एक और कहानी— अनीता। दिहाड़ी मजदूर बाप की बेटी। पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटी। दूसरी कक्षा में पढ़ते समय इलाज के अभाव में माँ गुजर गई थीं। तभी से बस एक ही सपना था— डॉक्टर बनना। बारहवीं कक्षा तक कभी दूसरे नंबर पर नहीं आई। राज्य बोर्ड की परीक्षा में 1200 में से 1176 अंक मिले थे। लेकिन नीट आ गया। अंग्रेजी-हिंदी का जाल, सीबीएसई पैटर्न और कोचिंग का खर्च। इन सबके आगे अनीता हार गई। उस दलित लड़की ने 1 सितंबर 2017 को आत्महत्या कर ली। उसी अनीता का सपना आज जंतर-मंतर पर हज़ारों युवाओं के सिर चढ़कर नारों के रूप में गूँज रहा है।
सिर्फ यह धर्मेंद्र प्रधान ही नहीं, इस आरएसएस-भाजपा के शासन में शिक्षा व्यवस्था के रोंगटे-रोंगटे में सड़न घुस चुकी है। सोचकर देखिए, जो छात्र भौतिक विज्ञान (Physics) में फेल हो जाता है, वह नीट में 720 में से 705 अंक कैसे पाता है? 2024 में एक साथ 67 छात्रों को 100 प्रतिशत अंक मिले। उनमें से कई एक ही परीक्षा केंद्र से थे, और वह भी हरियाणा के भाजपा नेता का! गिरफ्तार हुए अनुराग यादव ने बताया कि उसे एक महीने पहले ही हूबहू पेपर मिल गया था। ऐसी शिक्षा नीति लागू की गई है, जहाँ जो फेल हैं, वही नीट के टॉपर हैं! यही लोग हमारा इलाज करेंगे! सोचिए!
राज्य बोर्ड के छात्र पीछे छूट रहे हैं, और निजी कोचिंग संस्थान पैसों का विशाल पहाड़ खड़ा कर रहे हैं। 96 प्रतिशत नीट परीक्षार्थी कोचिंग से जुड़े हैं। जबकि 2017 के बाद से मेडिकल कॉलेजों में राज्य बोर्ड के छात्रों की संख्या घट रही है। गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चे अब डॉक्टर बनने का सपना नहीं देख सकते। पैसों की कमी से उनका रास्ता रुक रहा है। उस पर से पेपर लीक और परीक्षाएं रद्द। कोई पूर्व घोषणा नहीं, कोई जवाबदेही नहीं—यह घमंडी मोदी राज है। फॉर्म भरने की फीस बढ़ रही है, जबकि कई परिवार तो वही पैसा नहीं जुटा पाते!
बोलपुर के लड़के का सेंटर बादुड़िया पड़ा है, तो सिलचर की लड़की का सेंटर डिब्रूगढ़ में। पहुँचना ही दूभर है। गाड़ी, होटल—सब अतिरिक्त खर्च। सार्वजनिक परिवहन नहीं है, पीने का पानी नहीं, शौचालय नहीं, पंखा नहीं, घड़ी नहीं। किसकी जवाबदेही? कौन जवाब देगा? इसीलिए यह गुस्से की आग दिल्ली से लेकर कोलकाता तक फैल चुकी है।
और जो लोग यह सब नियंत्रित कर रहे हैं—जैसे एनटीए (NTA) के प्रमुख प्रदीप कुमार जोशी, जो आरएसएस के करीबी हैं और पहले यूपीएससी जैसी संस्था के प्रमुख रह चुके हैं। यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष ममिदाला, जो जेएनयू में छात्रों पर हमले के लिए कुख्यात हैं। यही लोग तो लाखों छात्रों के भविष्य का फैसला कर रहे हैं! मोदी सरकार शिक्षा का केंद्रीयकरण और एकल खिड़की व्यवस्था (single window system) चाहती है। शिक्षा को कॉरपोरेट और आरएसएस के हवाले करना चाहती है। जहाँ पैसों के बदले सीटें खरीदी-बेची जाएंगी, वहाँ सामाजिक असमानता चरम पर होगी। और इसी असमानता के खिलाफ एसएफआई पहले दिन से लड़ रही है। 27 अक्टूबर 2021 से वे नीट-विरोधी आंदोलन में विरोध जताते आ रहे हैं। वह विरोध आज तेलंगाना से लेकर उत्तर प्रदेश तक फैल चुका है, केरल में खून बहा है, हिमाचल में नाकेबंदी हुई है और बंगाल में महाजुलूस निकला है।
इस लड़ाई में 'रिपब्लिक' या 'जी 24 घंटा' जैसे कुछ मीडिया संस्थानों के पत्रकार जिस तरह संविधान की धज्जियां उड़ाकर धर्मनिरपेक्ष लोगों को देश छोड़ने को कहते हैं, जो नफरत की आग भड़काते हैं, उनके खिलाफ भी युवाओं में भारी गुस्सा है। क्योंकि यही मीडिया तब चुप था जब पुलिस ने निहत्थे छात्रों पर पैलेट गन चलाई थी। 21 छात्रों की आत्महत्या पर ये विचलित नहीं हुए। पत्रकारिता भूलकर इस गोदी मीडिया ने गोएबल्स जैसी झूठी बयानबाजी (Goebbelsian propaganda) की है। इनके प्रति घृणा जंतर-मंतर से लेकर कोलकाता तक उमड़ पड़ी है। इस आंदोलन की सबसे अद्भुत विशेषता है—आंदोलन की भाषा में बदलाव, अत्याचारी व दंभी शासक पर करारा तंज और 'जेन-जी' (Gen-Z) प्रदर्शनकारियों की रचनात्मकता।

लेकिन आखिरकार जंतर-मंतर की सड़कों पर जीत के गीत गूँजे हैं। मोदी के आवास से ढाई किलोमीटर के भीतर 'डीजे-वाइब' पर— 'रंग दे बसंती' और 'चक दे इंडिया' पर सब नाचे। लगातार छत्तीस दिन सड़कों पर गुजारने, लाठी, जेल, गैस, कड़ाके की धूप और उमस सब सहकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा कराने में यह 'कॉकरोच जनता पार्टी', एसएफआई समेत वामपंथी छात्र-युवा नेतृत्व वाले आंदोलनकारी सफल रहे हैं। इसीलिए तो शनिवार दोपहर से जंतर-मंतर का नज़ारा बदल गया। जहाँ आँसू थे, वहाँ हँसी थी, गले मिलना था। कोई कह रहा था, 'हम जीत गए।' तो कोई कह रहा था, 'यह अंत नहीं, यह तो शुरुआत है।' नारे लगे— "धर्मेंद्र तो सिर्फ झांकी है, मोदी-शाह बाकी हैं।"

इसलिए यह लड़ाई थमी नहीं है। NTA को रद्द करना होगा, NEET समेत सभी केंद्रीय परीक्षाएं रद्द करनी होंगी, राज्य बोर्डों की मान्यता बहाल करनी होगी, कोचिंग उद्योग का वर्चस्व कम करना होगा और शिक्षा की मुख्य बुनियाद—तबाह हो चुकी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था का पुनर्गठन करना होगा। और सबसे बड़ी बात, मेधा के नाम पर फिर किसी अनीता को आत्महत्या न करनी पड़े। यह लड़ाई सिर्फ पास होने के लिए नहीं, यह लड़ाई भविष्य बचाने के लिए है। धर्म के नाम पर विभाजन के खेल को इस देश के भविष्य ने समझ लिया है। वे कह रहे हैं कि जो वंचितों के साथ खड़े होंगे, वे भी हमारे साथ खड़े रहेंगे। यही उनका विश्वास है। और यही विश्वास एक दिन पूरे देश के एकजुट युवा समाज को हिमालय जैसी अटूट ताकत बनाकर खड़ा करेगा।

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साभार:बांग्ला दैनिक गणशक्ति | 28 जुलाई,2026
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अपलोडर: VKA-43UUB7 • प्रकाशित: 28 जुलाई 2026 • 9 मिनट पठन

श्रेया जायसवाल • 09 मई 2026

29 अप्रैल को चुनावों की व्यस्तता के बीच एक महत्वपूर्ण खबर शायद हममें से कई लोगों की नजरों से बच गई। उसी दिन, भारत के सबसे प्रमुख तर्कवादी विचारकों में से एक नरेंद्र दाभोलकर की गोली मारकर हत्या करने के आरोप में यूएपीए (UAPA) कानून के तहत दोषी ठहराए गए और उम्रकैद की सजा पाए मुख्य आरोपियों में से एक शरद कलासकर को बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस रंजितसिंह भोसले की डिवीजन बेंच ने जमानत दे दी। नरेंद्र दाभोलकर की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी — यह एक विचारधारा, एक आंदोलन और एक बौद्धिक परंपरा पर सीधा हमला था। दाभोलकर की हत्या का तरीका — मोटरसाइकिल सवार दो लोगों द्वारा गोलियां चलाना — भारत में इसके बाद हुए कई प्रगतिशील तर्कवादी शख्सियतों की हत्याओं के 'तरीके' (मोडस ऑपरेंडी) से मेल खाता है। गोविंद पानसरे (जानलेवा हमला: 16 फरवरी 2015, मृत्यु: 20 फरवरी 2015), एम. एम. कलबुर्गी (हत्या: 30 अगस्त 2015) और गौरी लंकेश (हत्या: 5 सितंबर 2017) - इन सभी की हत्याओं में भी ऐसा ही पैटर्न देखा गया। कहा जा रहा है कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि एक सुसंगठित नेटवर्क की ओर इशारा करती है, जो प्रगतिशील तर्कवादी आवाजों को खामोश करना चाहता है। नरेंद्र दाभोलकर को क्यों मरना पड़ा ? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए सिर्फ कानूनी प्रक्रिया को ही नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक-सामाजिक ताने-बाने को देखना होगा, जहाँ अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरपंथ और राजनीतिक स्वार्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
केशव कुमार भट्टड़ • 25 मई 2026

जिस तरह रेणु के "मैला आँचल" में मेरीगंज नायक की भूमिका में है वैसे ही मृणाल सेन की अधिकांश फिल्मों में कलकत्ता शहर नायक की भूमिका में दिखाई देता है।
श्रेया जायसवाल • 14 मई 2026
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