वर्षा में भींगी मुंबई के राजपथ पर खड़ी वह अकेली युवती केवल एक प्रदर्शनकारी की छवि नहीं है; वह आज के भारत के विवेक का प्रतीक है। उसका स्पर्श बख्तरबंद गाड़ी के लिए नहीं; हमारी सामाजिक चेतना पर है। उसका मौन प्रश्न हममें से प्रत्येक के लिए है।
जन समाचार मंच
वर्षा में भींगी मुंबई के राजपथ पर खड़ी वह अकेली युवती केवल एक प्रदर्शनकारी की छवि नहीं है; वह आज के भारत के विवेक का प्रतीक है। उसका स्पर्श बख्तरबंद गाड़ी के लिए नहीं; हमारी सामाजिक चेतना पर है। उसका मौन प्रश्न हममें से प्रत्येक के लिए है।

*डॉ. हिमाद्रि शेखर सरकार*

वर्षा में भींगी मुंबई का राजपथ। एक तरफ राज्य की शक्ति का प्रतीक—भारी बख्तरबंद पुलिस गाड़ी। दूसरी तरफ अकेली खड़ी हुई एक युवती। उसके हाथ में कोई हथियार नहीं, कोई ईंट-पत्थर नहीं, कोई तबाही की भाषा नहींर। वह केवल हाथ बढ़ाकर खड़ी है उस लोहे की गाड़ी की ओर। उस स्पर्श में कोई आक्रमण नहीं, केवल सवाल है। कोई नफ़रत नहीं, मौन विरोध है; कोई हिंसा नहीं, बल्कि न्यायसंगत भविष्य की एक माँग है।
दिल्ली के हालिया आंदोलन को यदि केवल एक राजनीतिक घटना बताकर व्याख्या की जाए, तो उसकी गहराई को समझा नहीं जा सकता। यह मूलतः विश्वास का संकट है। नागरिकों का अपने राज्य पर विश्वास, विद्यार्थियों का अपनी शिक्षा व्यवस्था पर विश्वास और कड़ी मेहनत के साथ मिलने वाले योग्य सम्मान पर विश्वास—जब इन विश्वासों की नींव हिलती है, तो समाज का आधार भी डगमगा जाता है। इसीलिए इस आंदोलन की गूँज आज केवल दिल्ली के राजपथ तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों के छात्र-युवाओं की चिंता और आक्रोश से मिलकर एक बड़े सामाजिक प्रश्न में बदल गई है।
पिछले कुछ वर्षों में देश की विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक होना, परीक्षाएँ रद्द होना, नियुक्तियों में अत्यधिक देरी, प्रशासनिक अनियमितताएँ और रोज़गार संकट ने लाखों छात्र-युवाओं के जीवन को अनिश्चितता के अँधेरे में धकेल दिया है। बड़ी संख्या में युवा अपने जीवन का सबसे रचनात्मक समय कोचिंग सेंटरों, पुस्तकालयों, परीक्षा हॉल और प्रतीक्षा सूचियों में बिता रहे हैं। लेकिन जब हर बार कड़ी मेहनत के बदले केवल अनिश्चितता मिलती है, तब नुकसान केवल एक उम्मीदवार का नहीं होता—नुकसान होता है देश की सरकार के प्रति लोगों के विश्वास का।
एक शोधकर्ता के नाते मैं जानता हूँ कि ज्ञान की बुनियाद पुनरुत्पादन क्षमता, पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रमाणीकृत तथ्यों पर टिकी होती है। राज्य और समाज के मामले में भी यही नियम लागू होता है। जो संस्थान पारदर्शी नहीं है, जो प्रशासन जवाबदेही के प्रति उदासीन है, और जो व्यवस्था योग्यता के स्थान पर अन्य प्रभावों को प्राथमिकता देती है, वह समय के साथ लोगों का विश्वास खो देती है। शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, नियुक्ति में जवाबदेही और मूल्यांकन में न्यायप्रियता का अभाव एक समाज के भविष्य को कमजोर करता है। जैसे विज्ञान असत्य तथ्यों को स्वीकार नहीं करता, वैसे ही कोई भी राज्य लंबे समय तक अन्याय, विषमता और अव्यवस्था के बल पर टिका नहीं रह सकता।
आज का छात्र आंदोलन केवल परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के खिलाफ नहीं है। यह उस सामाजिक वास्तविकता के खिलाफ है जहाँ मेहनत की कोई गारंटी नहीं, लेकिन अनिश्चितता का निश्चय है; जहाँ सपने देखना आसान है, लेकिन उन सपनों का पूरा होना धीरे-धीरे कठिन होता जा रहा है। जब कोई युवा महसूस करता है कि उसकी लगन से ज़्यादा अव्यवस्था शक्तिशाली है, तो उसका विरोध किसी एक घटना तक सीमित नहीं रहता; वह एक पूरी पीढ़ी के भविष्य, गरिमा और न्याय के अधिकार की माँग बन जाता है।
इस आंदोलन का सबसे शक्तिशाली पहलू इसकी प्रतीक-भाषा है। जो युवती बख्तरबंद गाड़ी की ओर हाथ बढ़ाकर खड़ी है, वह राज्य को पराजित करने नहीं आई है। वह राज्य को याद दिलाने आई है—राज्य का अस्तित्व जनता के लिए है। लोकतंत्र में नागरिक कभी राज्य के शत्रु नहीं हो सकते। राज्य और नागरिक का संबंध प्रतिद्वंद्विता का नहीं, बल्कि परस्पर विश्वास का होता है।
आज की युवा पीढ़ी केवल नौकरी नहीं चाहती; वह एक न्यायपूर्ण समाज चाहती है। वे एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहते हैं जहाँ प्रश्नपत्र लीक न हों, एक ऐसी भर्ती प्रणाली चाहते हैं जहाँ योग्यता ही एकमात्र मापदंड हो।
किसी राज्य की असली ताकत उसकी बख्तरबंद गाड़ियाँ नहीं हैं, न ही उसके अनुसंधान केंद्र या अर्थव्यवस्था हैं; उसकी असली ताकत उसके लोगों का विश्वास है। जब विश्वास एक बार टूट जाता है, तो उसे फिर से जोड़ना सबसे कठिन काम होता है। न्यूटन का गति का तीसरा नियम हमें सिखाता है—हर क्रिया की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। समाज भी इसका अपवाद नहीं है; वर्षों का अन्याय, भेदभाव और अस्पष्टता अंततः लोगों के प्रतिरोध की भाषा ढूंढ ही लेती है। उसी प्रतिक्रिया का नाम आज का यह आंदोलन है।
प्रकृति का एक मौलिक नियम है—जो व्यवस्था लंबे समय तक साम्य अवस्था से दूर रहती है, वह अंततः एक नई साम्य व्यवस्था की ओर बढ़ती है। समाज भी इससे अलग नहीं है। दीर्घकालिक रअसमानता, वंचना और अनिश्चितता अंततः परिवर्तन की माँग उठाती ही हैं। सवाल यह है कि—क्या वह परिवर्तन संवाद, सुधार और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से आएगा, या टकराव के माध्यम से? यह फैसला राज्य, समाज और नागरिक—सभी का है।
आज दमन की नहीं, संवाद की जरूरत है। आश्वासनों की नहीं, ठोस कदमों की जरूरत है। प्रश्नों को चुप कराना नहीं, बल्कि प्रश्नों के उत्तर देना ज़रूरी है। क्योंकि एक लोकतांत्रिक समाज की ताकत मतभेदों को दबाने में नहीं, बल्कि उन मतभेदों को सम्मानपूर्वक सुनकर, पारदर्शिता और जवाबदेही के माध्यम से विश्वास को फिर से बनाने की क्षमता में निहित होती है। इतिहास सिखाता है—जो राज्य अपने युवाओं की आवाज़ सुनता है, उनकी चिंताओं पर ध्यान देता है और उनकी न्यायपूर्ण अपेक्षाओं का उत्तर देता है, वही राज्य स्थायी और शक्तिशाली बनता है; और जो राज्य इस आवाज़ की उपेक्षा करता है, वह धीरे-धीरे अपने भविष्य की नींव को कमजोर कर लेता है।
वर्षा में भींगी मुंबई के राजपथ पर खड़ी वह अकेली युवती केवल एक प्रदर्शनकारी की छवि नहीं है; वह आज के भारत के विवेक का प्रतीक है। उसका स्पर्श बख्तरबंद गाड़ी के लिए नहीं; हमारी सामाजिक चेतना पर है। उसका मौन प्रश्न हममें से प्रत्येक के लिए है।
> क्या हम एक ऐसे भारत का निर्माण कर सकेंगे जहाँ मेहनत का मूल्य होगा, ज्ञान की गरिमा होगी और विज्ञान की तरह सत्य व पारदर्शिता हर संस्थान का आधार बनेगी, ताकि युवाओं के सपने कभी प्रशासनिक विफलताओं के आगे घुटने न टेकें?
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साभार:बांग्ला दैनिक गणशक्ति

{लेखक वैज्ञानिक और licb post doctoral Fellow हैं}
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अपलोडर: VKA-43UUB7 • प्रकाशित: 27 जुलाई 2026 • 6 मिनट पठन

श्रेया जायसवाल • 09 मई 2026

29 अप्रैल को चुनावों की व्यस्तता के बीच एक महत्वपूर्ण खबर शायद हममें से कई लोगों की नजरों से बच गई। उसी दिन, भारत के सबसे प्रमुख तर्कवादी विचारकों में से एक नरेंद्र दाभोलकर की गोली मारकर हत्या करने के आरोप में यूएपीए (UAPA) कानून के तहत दोषी ठहराए गए और उम्रकैद की सजा पाए मुख्य आरोपियों में से एक शरद कलासकर को बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस रंजितसिंह भोसले की डिवीजन बेंच ने जमानत दे दी। नरेंद्र दाभोलकर की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी — यह एक विचारधारा, एक आंदोलन और एक बौद्धिक परंपरा पर सीधा हमला था। दाभोलकर की हत्या का तरीका — मोटरसाइकिल सवार दो लोगों द्वारा गोलियां चलाना — भारत में इसके बाद हुए कई प्रगतिशील तर्कवादी शख्सियतों की हत्याओं के 'तरीके' (मोडस ऑपरेंडी) से मेल खाता है। गोविंद पानसरे (जानलेवा हमला: 16 फरवरी 2015, मृत्यु: 20 फरवरी 2015), एम. एम. कलबुर्गी (हत्या: 30 अगस्त 2015) और गौरी लंकेश (हत्या: 5 सितंबर 2017) - इन सभी की हत्याओं में भी ऐसा ही पैटर्न देखा गया। कहा जा रहा है कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि एक सुसंगठित नेटवर्क की ओर इशारा करती है, जो प्रगतिशील तर्कवादी आवाजों को खामोश करना चाहता है। नरेंद्र दाभोलकर को क्यों मरना पड़ा ? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए सिर्फ कानूनी प्रक्रिया को ही नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक-सामाजिक ताने-बाने को देखना होगा, जहाँ अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरपंथ और राजनीतिक स्वार्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
केशव कुमार भट्टड़ • 25 मई 2026

जिस तरह रेणु के "मैला आँचल" में मेरीगंज नायक की भूमिका में है वैसे ही मृणाल सेन की अधिकांश फिल्मों में कलकत्ता शहर नायक की भूमिका में दिखाई देता है।
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