मजदूरों की लड़ाई के साथ

सामाजिक न्याय के संघर्ष को जोड़कर ही

भारतीय वामपंथी आगे बढ़ेंगे

- एम ए बेबी

               जकल चुनाव और संगठन के स्तर पर जो कमजोरी दिख रही है, उसे देखकर वामपंथियों को निराश होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। नव-उदारवाद (अंधाधुंध निजीकरण और खुली छूट वाली नीति) का खोखलापन अब धीरे-धीरे सबके सामने आ रहा है। आज के राजनीतिक माहौल में लगभग सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियां इसी ढर्रे पर चल रही हैं। जनता को एक अलग और बेहतर रास्ता दिखाने की सोच सिर्फ वामपंथ के पास ही है। यही राजनीतिक माहौल भारत में वामपंथ के भविष्य को सुरक्षित करता है। अंग्रेजी की पाक्षिक (हर पंद्रह दिन में छपने वाली) पत्रिका 'फ्रंटलाइन' को दिए एक इंटरव्यू में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [(सीपीआई (एम)] के महासचिव एम ए बेबी ने यह बात कही। टी के राजलक्ष्मी के साथ बातचीत में उन्होंने हाल ही में खत्म हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों और वामपंथ के भविष्य पर खुलकर चर्चा की।

                जब उनसे पूछा गया कि क्या वामपंथी लोग नव-उदारवाद, धर्म के नाम पर होने वाले ध्रुवीकरण और पहचान की राजनीति (जाति-धर्म के नाम पर वोट मांगना) जैसी चुनौतियों का सामना अपनी विचारधारा के दायरे में रहकर ठीक से कर पाएंगे? तो इस पर एम. ए. बेबी ने जोर देकर कहा कि बिल्कुल कर पाएंगे! इन चुनौतियों से निपटने के लिए हमें अपनी राजनीतिक और वैचारिक सोच को वक्त के हिसाब से लगातार अपडेट करते रहना होगा। ये चीजें लोगों की बुनियादी समस्याओं का कोई असली हल नहीं ढूंढती हैं। हमें गरीबों और मजदूरों की भलाई की सोच को कायम रखते हुए, उसे सामाजिक न्याय (यानी सबको बराबरी का हक दिलाने) की लड़ाई से जोड़ना होगा और इसी रास्ते पर आगे बढ़ना होगा। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिकता और धर्म के नाम पर होने वाली गुटबाजी के खिलाफ लड़ाई भी इसी रास्ते से जीती जा सकती है। इसके साथ ही, हमें आम धार्मिक लोगों और धर्म को राजनीति का हथियार बनाने वाले नेताओं के बीच का अंतर समझना होगा। वामपंथियों को उन आम लोगों को अपने साथ जोड़ना होगा और धर्म का धंधा करने वालों के खिलाफ खड़े करना होगा।

                भारत में वामपंथियों का असली मुकाबला किससे है? इस सवाल पर सीपीआई(एम) के महासचिव एम. ए. बेबी ने कहा कि बीजेपी और आरएसएस के खिलाफ वैचारिक और राजनीतिक लड़ाई लड़ना ही इस वक्त हमारा सबसे पहला और मुख्य काम है। यह लड़ाई उन आर्थिक नीतियों के खिलाफ भी है जो सिर्फ बड़े पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाती हैं और आम जनता का नुकसान करती हैं। इसके साथ-साथ जाति के नाम पर होने वाले अत्याचार, महिलाओं के शोषण और अल्पसंख्यकों व समाज के पिछड़े तबकों के अधिकारों की रक्षा करना भी हमारे मुख्य एजेंडे में शामिल है।

                संसद में सीटें कम होने पर वामपंथी जनता के खिलाफ बनने वाली नीतियों का विरोध कैसे करेंगे? इस पर एम. ए. बेबी ने कहा कि संसदीय राजनीति की अपनी जगह अहमियत है, लेकिन हम संसद के बाहर भी लोगों की रोजी-रोटी से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन खड़े करते हैं। उत्तर भारत के 13 राज्यों में माकपा (सीपीआई(एम)) ने 33 'जन आक्रोश यात्राएं' निकाली थीं, जिनमें ग्रामीण गरीबों, खेतिहर मजदूरों, किसानों, कामगारों और आम लोगों की दिक्कतों को उठाया गया। इसी का नतीजा था कि 24 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बहुत बड़ी रैली हुई। उन्होंने कहा कि लोगों की रोजी-रोटी से जुड़े सवालों को हमें और भी मजबूती से उठाना होगा। साथ ही, हर स्तर पर जनता के साथ नियमित और गहरा तालमेल बनाए रखना बेहद जरूरी है।

                एम. ए. बेबी ने आगे कहा कि 1977 के बाद यह पहली बार हुआ है जब किसी भी राज्य में सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाली सरकार नहीं है। चुनाव के अलावा भी जनता के बीच हमारा असर थोड़ा कम हुआ है। लेकिन हमें पूरा भरोसा है कि हम इस नाकामयाबी की वजहों को पहचान लेंगे और अपनी कमियों को सुधारते हुए दोबारा मजबूती से खड़े होंगे। इसके लिए हमें अपनी बुनियादी राजनीति को छोड़े बिना वक्त के हिसाब से नई रणनीतियां अपनानी होंगी। उन्होंने माना कि वामपंथी राजनीति को युवाओं और आज की नई पीढ़ी (Gen-Z) तक पहुंचाना थोड़ा मुश्किल काम जरूर है, पर यह नामुमकिन नहीं है। उनसे जुड़ने के लिए हमें नए तरीके ढूंढने होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि देश में बढ़ती धार्मिकता, उसका गलत फायदा उठाकर होने वाला सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और 'कम्युनिस्ट धर्म के विरोधी होते हैं'— जैसा सोचा-समझा झूठा प्रचार भी हमारे सामने बड़ी चुनौतियां हैं, जिनका हमें मुकाबला करना ही होगा।

                क्या वामपंथी दल चुनावों के अलावा भी खुद को नए सिरे से मजबूत कर पाएंगे? इस सवाल के जवाब मेंएम. ए. बेबी ने कहा कि अगर वामपंथी चुनावों से अलग हटकर खुद को दोबारा खड़ा नहीं कर पाए, तो सिर्फ वामपंथ का ही नहीं, बल्कि पूरे देश का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। नोएडा में आंदोलन कर रहे कॉन्ट्रैक्ट (ठेका) मजदूरों के साथ खड़े होना इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। वहां कोई और राजनीतिक दल या ट्रेड यूनियन उस तरह आगे नहीं आया। कामकाजी और मेहनत करने वाले लोगों की आजादी और हक की आवाज बनना ही वामपंथी राजनीति की सबसे बड़ी खासियत है।

                पैसे की ताकत और कॉर्पोरेट मीडिया के असर से निपटने के सवाल पर एम. ए. बेबी ने कहा कि आजकल राजनीति सिर्फ चुनाव लड़ने तक सिमट कर रह गई है और चुनावों को भारी-भरकम पैसे व कॉर्पोरेट मीडिया के जरिए कंट्रोल किया जा रहा है। ऐसे में वामपंथियों को जनता से जुड़ने के नए और अलग रास्ते निकालने होंगे— जैसे मोहल्लों में छोटी बैठकें करना, सीधे लोगों के घर जाकर संपर्क बनाना आदि। केरल का 'कैराली टीवी' और 'लेफ्ट व्यूज' पोर्टल इसी तरह की कोशिशों के उदाहरण हैं। इसके साथ ही उन्होंने चुनावी सुधारों की मांग को और तेज करने की बात कही।

                सीपीआई (एम) नेता ने केरल और पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों से जुड़े कई सवालों के जवाब भी दिए। उन्होंने कहा कि पिछले दस सालों में केरल की एलडीएफ सरकार ने यह करके दिखाया है कि देश के संघीय ढांचे की तमाम पाबंदियों के बावजूद कैसे एक बराबरी वाला समाज बनाया जा सकता है, भयंकर गरीबी को मिटाया जा सकता है और आम लोगों की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। साथ ही, वहां इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास और नॉलेज इकोनॉमी (ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था) की तरफ कदम बढ़ाकर पढ़े-लिखे बेरोजगारों की समस्या को हल करने की कोशिश भी की गई। फिर केरल में इतनी बड़ी चुनावी हार क्यों हुई? खुद यह सवाल उठाते हुए एम. ए. बेबी ने कहा कि इसका जवाब बहुत पेचीदा है। गरीब तबका तो आज भी हमारे साथ खड़ा है, लेकिन मध्यवर्ग का एक हिस्सा हमसे छिटक गया है। इसके पीछे जाति और समुदाय वाली पहचान की राजनीति का गहरा असर है। हमें यह भी शक है कि कुछ सीटों पर एनडीए और यूडीएफ के बीच अंदरूनी तौर पर वोटों का हेरफेर हुआ है। हालांकि एलडीएफ के वोट कम हुए हैं, लेकिन राहत की बात यह है कि एनडीए का वोट प्रतिशत भी गिरा है। अब हमारा सबसे बड़ा काम यह पता लगाना है कि वोट हमसे दूर क्यों गए ? लगातार सरकार में रहने से काम में थोड़ी ढिलाई या गिरावट आने का खतरा रहता ही है। हमने खुद अपनी कमियों को सुधारने वाले दस्तावेजों में इस बात को लेकर आगाह किया था। ऐसा लगता है कि हम उन कमजोरियों को समय पर दूर नहीं कर पाए। जनता वामपंथियों से बहुत ऊंचे दर्जे के काम की उम्मीद रखती है, शायद हम उनकी उम्मीदों पर पूरी तरह खरे नहीं उतर सके। इसीलिए अब निचले स्तर से लेकर ऊपर तक खुले तौर पर कमियों को स्वीकारने की प्रक्रिया चल रही है। केरल में सामाजिक सुधार आंदोलन, आजादी की लड़ाई, मजदूर-किसानों के संगठन, जमीन सुधार, मजदूरी में बढ़ोतरी, सबको शिक्षा और अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था हमारी ऐतिहासिक ताकत रही हैं। इसलिए हमें पूरा भरोसा है कि हम फिर से मजबूती से वापसी करेंगे।

                पश्चिम बंगाल में दोबारा खड़े होने की सबसे बड़ी चुनौती क्या है? इसके जवाब में एम. ए. बेबी ने कहा कि इस बार के चुनाव में अलग-अलग छोटे-बड़े वामपंथी संगठनों, यहाँ तक कि भाकपा-माले (लिबरेशन) को भी एक साथ लाना मुमकिन हो पाया है। भारी तादाद में नौजवान लड़के-लड़कियां, छात्र, महिलाएं और बुजुर्ग इस मुहिम का हिस्सा बने। बड़ी रैलियों और आंदोलनों को जनता का बहुत अच्छा साथ मिला है। अब इस जमीनी माहौल और आंदोलन को वोटों में बदलना होगा। हमें यकीन है कि यह बहुत जल्द हो जाएगा। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के इस दावे पर कि माकपा ने कुछ सीटों पर बीजेपी की मदद की, एम. ए. बेबी ने कहा कि यह मुख्यमंत्री की एक चतुर राजनीतिक चाल थी, ताकि माकपा (सीपीआई(एम)) समर्थकों और वामपंथी सोच वाले लोगों को भड़काया या भ्रमित किया जा सके। हमारे कार्यकर्ता राजनीतिक रूप से बहुत समझदार हैं। वे आरएसएस के इशारों पर चलने वाली बीजेपी के खतरे को अच्छी तरह समझते हैं। माकपा संघ परिवार और बीजेपी के खिलाफ अपनी बिना रुके चलने वाली लड़ाई जारी रखेगी। धर्मनिरपेक्षता , रोजी-रोटी, जातिवाद के खिलाफ संघर्ष और शोषण के खिलाफ लड़ाई ही हमारा असल काम है। इस हकीकत से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए ही ऐसा झूठा प्रचार किया जाता है।

                'इंडिया' गठबंधन और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के साथ चल रहे मतभेदों के सवाल पर एम. ए. बेबी ने साफ कहा कि तृणमूल कांग्रेस भले ही राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया गठबंधन का हिस्सा हो, लेकिन उनके राज में पश्चिम बंगाल में हमारे सैकड़ों कार्यकर्ताओं की जान ली गई है। अनगिनत झूठे केस, बलात्कार, उत्पीड़न, हमले और लोगों को उनके घरों से भगाने की घटनाएं हुई हैं। ऐसी स्थिति में ममता बनर्जी का बीजेपी के खिलाफ एकजुट होने का नारा बिल्कुल अजीब और बेमेल लगता है। उन्होंने कहा कि इंडिया गठबंधन के कामकाज में कुछ व्यावहारिक दिक्कतें जरूर हैं। फिर भी, चुनाव के समय बीजेपी के खिलाफ अलग-अलग राजनीतिक ताकतों को राज्यों की जमीनी हकीकत के हिसाब से एक साथ लाना संभव होगा। संसद के अंदर भी तालमेल बना रहेगा। लेकिन कुछ राज्यों में स्थानीय कारणों से जमीन पर एक साथ मिलकर चलना वाकई मुश्किल है, और इस कड़वी सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।

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साभार : बांग्ला दैनिक गणशक्ति, 02 जून 2026