'सतलुज': अँधेरों को चुनौती देता सच

-केशव भट्टड़
निर्देशक: हनी त्रेहान
निर्माता: रॉनी स्क्रूवाला (RSVP मूवीड) और मैकगफिन पिक्चर्स (MacGuffin Pictures)
मुख्य कलाकार: दिलजीत दोसांझ, सुविंदर विक्की, अर्जुन रामपाल, गीतिका विद्या ओहल्यान, कँवलजीत सिंह, सौरभ सचदेवा, बदोला
सिनेमैटोग्राफर: के.यू. मोहनन
संपादक: ए. श्रीकर प्रसाद
रेटिंग: ★★★★½ (4.5/5)
1. सेंसरशिप की ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई और 'स्ट्राइजैंड इफेक्ट'
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों के लिए नहीं, बल्कि इतिहास के दबे हुए पन्नों को जिंदा करने के लिए बनाई जाती हैं। निर्देशक हनी त्रेहान की फिल्म 'सतलुज' (पूर्व नाम: घल्लूघारा / पंजाब '95) एक ऐसी ही फिल्म है। यह फिल्म सिर्फ एक सिनेमाई अनुभव नहीं, बल्कि पंजाब के इतिहास और समकालीन भारतीय राजनीति का एक ऐसा विस्फोटक कोलाज है, जिसने सेंसरशिप से लेकर नेशनल सिक्योरिटी (राष्ट्रीय सुरक्षा) तक की कई बहसों को दोबारा जिंदा कर दिया है।
इस फिल्म का सफर सत्य और सेंसरशिप की एक वैश्विक जंग बन चुका है। साल 2022 में जब इसे 'घल्लूघारा' (सिख इतिहास में नरसंहार के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द) नाम से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के पास भेजा गया, तो बोर्ड ने इसका 'A' (Adult) सर्टिफिकेट रोक दिया और 127 कट्स की मांग की। सेंसर बोर्ड का सबसे बड़ा ऐतराज यह था कि फिल्म में पंजाब पुलिस के अत्याचारों को 'एकतरफा और संस्थागत' (institutionalized) दिखाकर राज्य की साख को गिराया गया है। बोर्ड चाहता था कि फिल्म से 'पंजाब' और 'कनाडा' जैसे शब्द, वास्तविक नाम तथा सिखों से जुड़े संदर्भ पूरी तरह हटा दिए जाएं। इसके कारण 2023 में 'टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल' (TIFF) में होने वाले इसके वर्ल्ड प्रीमियर को भी भारतीय प्राधिकारियों के दबाव में वापस लेना पड़ा था।
मेकर्स ने इस दमन के आगे झुकने से इनकार कर दिया और निर्माता रॉनी स्क्रूवाला व मैकगफिन पिक्चर्स बॉम्बे हाईकोर्ट गए। अदालत में यह ऐतिहासिक दलील दी गई कि फिल्म पूरी तरह से सीबीआई (CBI) की चार्जशीट, अदालती फैसलों और मानवाधिकारों के आधिकारिक रिकॉर्ड पर आधारित है, इसलिए इसे 'फिक्शन' या 'मनगढ़ंत' कहकर रोका नहीं जा सकता। कानूनी पेचीदगियों और सेंसर बोर्ड को बाईपास करने के लिए फिल्म का नाम तीन बार बदला गया (घल्लूघारा से पंजाब '95 और अंततः सतलुज)।
चूंकि ओटीटी प्लेटफॉर्म सीधे तौर पर सेंसर बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते, इसलिए निर्माताओं ने इसे चुपचाप 'सतलुज' नाम से 3 जुलाई, 2026 को ZEE5 पर बिना किसी कट के रिलीज कर दिया। लेकिन महज 48 घंटे के भीतर (5 जुलाई, 2026 को) केंद्र सरकार ने आईटी रूल्स 2021 (Intermediary Guidelines) के तहत "सुरक्षा चिंताओं" (Security Concerns) का हवाला देते हुए इसे 'टेक डाउन' करने (हटाने) का निर्देश दे दिया। सरकार का तर्क था कि मेकर्स ने पिछले दरवाजे से इसे रिलीज किया है। हालांकि, इंटरनेट के इस दौर में 'स्ट्राइजैंड इफेक्ट' देखने को मिला; भले ही भारत में यह हट गई हो, लेकिन ZEE5 ग्लोबल पर विदेशों (कनाडा, अमेरिका, यूके, ऑस्ट्रेलिया) में यह लगातार स्ट्रीम हो रही है और भारत में लोग इसे टेलीग्राम, टोरेंट और सोशल मीडिया ग्रुप्स के जरिए पायरेटेड रूप में ढूंढ-ढूंढकर देख रहे हैं।

2. जसवंत सिंह खालरा (1952 – 1995) की विरासत
यह फिल्म वास्तविक घटनाओं पर आधारित एक बायोग्राफिकल इन्वेस्टिगेटिव थ्रिलर (जांच-आधारित थ्रिलर) है, जो मुख्य रूप से 1984 से 1995 के कालखंड, विशेषकर 1990 से 1995 के उन वर्षों को दर्शाती है जब पंजाब में उग्रवाद (militancy) अपने अंतिम और सबसे हिंसक दौर में था। फिल्म के नायक जसवंत सिंह खालरा पंजाब के अमृतसर के 'खालरा' गाँव के एक बेहद सम्मानित मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील और को-ऑपरेटिव बैंक में डायरेक्टर थे। उनके दादा सरूप सिंह एक स्वतंत्रता सेनानी और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। खालरा स्वभाव से बेहद संवेदनशील, बौद्धिक और कानून की गहरी समझ रखने वाले पारिवारिक व्यक्ति थे।
1990 के दशक की शुरुआत में जब उनके एक मित्र और मानवाधिकार कार्यकर्ता अचानक लापता हो गए, तो उनकी तलाश करते हुए खालरा का सामना एक खौफनाक सच से हुआ। उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर अमृतसर, पट्टी और तरनतारन के श्मशान घाटों के नगर निगम रजिस्टरों, मृत्यु प्रमाणपत्रों और मुंशियों के बही-खातों को खंगाला। उन्होंने यह ऐतिहासिक और पुख्ता सबूत इकट्ठा किया कि पंजाब पुलिस ने उग्रवाद को कुचलने के नाम पर निर्दोष युवाओं को अवैध रूप से हिरासत में लिया, फर्जी मुठभेड़ों (Extrajudicial Killings) में उनकी हत्या की और रिकॉर्ड में उन्हें 'लावारिस' (Unclaimed Bodies) दिखाकर गुपचुप तरीके से उनका दाह-संस्कार कर दिया। खालरा ने ऐसे लगभग 25,000 लापता लोगों का डेटा इकट्ठा किया।
1995 में वे इन अकाट्य सबूतों के साथ कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन गए और वहां की संसदों, विश्व समुदाय तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के सामने इस दमनकारी चेहरे को बेनकाब किया। भारत लौटने पर पुलिस की धमकियों के बावजूद वे पीछे नहीं हटे। अंततः, 6 सितंबर, 1995 को जब वे अमृतसर में अपने घर के बाहर कार धो रहे थे, तब सादे कपड़ों में आए पुलिसकर्मियों ने उनका अपहरण कर लिया। कस्टडी में उन्हें भयंकर यातनाएं (Torture) दी गईं और अक्टूबर 1995 में पुलिस हिरासत में ही उनकी हत्या करके उनके शव को 'हरीके पत्तन' (सतलुज और ब्यास नदियों का संगम) में बहा दिया गया, जो 90 के दशक में लावारिस लाशों को ठिकाने लगाने का डंपिंग ग्राउंड बन चुका था। खालरा की शहादत के बाद चौतरफा दबाव के कारण सुप्रीम कोर्ट ने जांच सीबीआई (CBI) को सौंपी, जिसने खालरा के दावों को सही पाया और कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को उम्रकैद की सजा हुई। आज उन्हें वैश्विक मानवाधिकार आंदोलनों में एक 'शहीद' का दर्जा प्राप्त है।
3. पटकथा, निर्देशन और विचलित करने वाले प्रमुख दृश्य
निर्देशक हनी त्रेहान ने बिना किसी लाउड ड्रामे या मेलोड्रैमेटिक हुए इस संवेदनशील विषय को संभाला है। फिल्म का पहला हिस्सा एक दस्तावेजी बनाम सिनेमाई शैली (procedural drama) में चलता है, जहाँ कागजों और रिकॉर्ड्स के जरिए सच को बुना जाता है। दूसरा हिस्सा, जहाँ एक बेहद संतुलित और ठहराव भरे सीबीआई अधिकारी (अर्जुन रामपाल) की एंट्री होती है, फिल्म एक हाई-स्टेक्स चूहे-बिल्ली के खेल (cat-and-mouse game) वाले राजनीतिक थ्रिलर में बदल जाती है।
'सतलुज' शारीरिक हिंसा से ज्यादा मनोवैज्ञानिक और प्रशासनिक हिंसा से दर्शकों को विचलित करती है। निर्देशक ने हिंसा को सनसनीखेज बनाने के लिए बेवजह खून-खराबा नहीं दिखाया, बल्कि उसके भावनात्मक असर को पकड़ा है। फिल्म के चार सबसे विचलित करने वाले दृश्य इसके गवाह हैं:
श्मशान घाट के रजिस्टरों का दृश्य: जब खालरा दुर्गाणिया श्मशान घाट के मुंशी के पुराने, धूल भरे सरकारी रजिस्टर खोलते हैं, तो कैमरा उन पन्नों पर घूमता है जहाँ बेहद ठंडे और प्रशासनिक तरीके से लिखा है—"लावारिस लाश, उम्र लगभग 22 वर्ष, दाह संस्कार के लिए लकड़ी का खर्च: 20 रुपये।" यह दृश्य दिखाता है कि कैसे हजारों नौजवानों की जिंदगी की कीमत को सिर्फ ₹20 के आंकड़े में समेटकर मिटा दिया गया।
गर्भवती महिला के अपहरण का दृश्य: रात के अंधेरे में पुलिस एक घर पर छापा मारकर एक युवक, उसकी मां और उसकी गर्भवती पत्नी को जबरन गाड़ियों में ठूंस देती है। यहाँ कोई मार-काट नहीं दिखाई जाती; केवल गाड़ियों के दरवाजे बंद होने की आवाज, महिला की चीखें और अगले शॉट में सुबह के धुंधलके में नदी के किनारे खड़ी गाड़ियों व जमीन पर पड़ी कुछ लावारिस चप्पलों पर कैमरा ठहर जाता है, जो दर्शक को ज्यादा डराता है।
एस पी सुग्गा के दफ्तर की मानसिक क्रूरता: सुग्गा अपने दफ्तर में बैठकर आराम से चाय पी रहा है और समोसा खा रहा है, जबकि ठीक बगल वाले कमरे से एक युवक की प्रताड़ना की दर्दनाक चीखें आ रही हैं। सुग्गा के चेहरे पर कोई शिकन नहीं है, वह इसी बीच अपने सब-ऑर्डिनेट से पूछता है कि आज रात कितने 'पार' (एनकाउंटर) करने हैं। जब जुल्म करने वाले के लिए चीखें बैकग्राउंड म्यूजिक जैसी बन जाएं, तो वह अमानवीयता की पराकाष्ठा है।
खालरा की गिरफ्तारी का दृश्य: जब अंततः सादे कपड़ों में पुलिस उन्हें उनके घर के बाहर से उठाती है, तो कोई चीख-पुकार नहीं होती। खालरा विरोध नहीं करते, वे बस शांत नजरों से अपने घर की तरफ देखते हैं। उनके चेहरे पर डर के बजाय एक अजीब सा ठहराव है, जो दर्शकों को एक बेबसी और गुस्से से भर देता है कि हजारों को सच बताने वाला खुद एक 'लापता' आंकड़ा बनने जा रहा है।

4. कलाकारों का उत्कृष्ट अभिनय
दिलजीत दोसांझ (जसवंत सिंह खालरा के रूप में): 'अमर सिंह चमकीला' के बाद, यह दिलजीत के करियर का सबसे बेहतरीन और लाइफ-चेंजिंग परफॉर्मेंस है। उन्होंने खालरा को कोई लाउड 'फिल्मी हीरो' नहीं बनाया। उनकी आंखों की बेबसी, शांत आवाज और दृढ़ता बिना भारी-भरकम डायलॉग्स के बहुत कुछ कह जाती है। उनकी सबसे बड़ी ताकत 'कागज और सच' हैं।
सुविंदर विक्की (एस पी सुग्गा के रूप में): वे एक क्रूर, ठंडे स्वभाव वाले और व्यवस्था के नशे में चूर पुलिस अधिकारी के रूप में इतने सहज हैं कि बिना चिल्लाए पर्दे पर खौफ पैदा कर देते हैं। उनका यह अटूट विश्वास कि 'इतिहास उनसे कभी सवाल नहीं पूछेगा', उनके किरदार को और अधिक खतरनाक बनाता है।
अर्जुन रामपाल: उन्होंने सीबीआई के विशेष जांच अधिकारी के रूप में एक बहुत ही ठहराव भरा अभिनय किया है, जो बाहर से आकर पंजाब के इस सच को टटोलता है।
गीतिका विद्या ओहल्यान: जसवंत सिंह खालरा की मजबूत और साहसी पत्नी परमजीत कौर के रूप में उनका स्क्रीन टाइम भले ही कम हो, उन्होंने एक पीड़ित और दृढ़ महिला के दर्द को बखूबी जिया है।
अन्य सहायक कलाकार: कँवलजीत सिंह ने डीजीपी इंदरपाल सिंह बीट्टा के रूप में एक वरिष्ठ और क्रूर पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई है। सौरभ सचदेवा ने आंतरिक द्वंद्व से जूझते कनिष्ठ पुलिस अधिकारी (कॉन्स्टेबल सतनाम सिंह) के रूप में, और अभिनेता वरुण बडोला ने अदालत में खालरा का साथ देने वाले कानूनी सलाहकार व वकील के रूप में प्रामाणिक अभिनय किया है। जसवंत सिंह (दिलजीत दोसांझ) के पिता करतार सिंह की भूमिका वरिष्ठ पंजाबी अभिनेता जसबीर गिल ने निभाई है।
5. तकनीकी पहलू और 'काव्यात्मक न्याय'
के.यू. मोहनन की सिनेमैटोग्राफी फिल्म की रीढ़ है। फिल्म के दृश्य बेहद ठंडे, धुंधले और उदास (melancholic) रखे गए हैं। 90 के दशक के पंजाब के सूने खेतों, रात के सन्नाटे में बिना लाइट के दौड़ती पुलिस की गाड़ियां और दिन के उजाले में भी छाई एक अजीब सी खामोशी को कैमरे ने इस तरह पकड़ा है जैसे हवा में भी डर का वास हो। ए. श्रीकर प्रसाद का संपादन और फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर दृश्यों की गंभीरता को बढ़ाते हुए दिल में एक अजीब सा सूनापन और खौफ पैदा करता है, जो फिल्म खत्म होने के बाद भी दिमाग से नहीं निकलता।
फिल्म का एक सबसे महत्वपूर्ण और गहरा तकनीकी सीक्वेंस एस पी सुग्गा का अंत है। जब सीबीआई की जांच का शिकंजा कसता है, तो सुग्गा अपने सीनियर अधिकारी डीजीपी 'बिट्टा' को फोन करता है। यहाँ वह पूरी तरह टूट जाता है और अपनी बंदूकों व गाड़ियों को छोड़कर अकेला सुनसान रेलवे ट्रैक (Railway Track) की तरफ निकल जाता है और ट्रेन से कटकर आत्महत्या कर लेता है। यह दृश्य एक काव्यात्मक न्याय (Poetic Justice) की तरह है—जिस पुलिस अधिकारी ने हजारों इंसानों को मारकर लावारिस छोड़ दिया था, उसका अपना शरीर भी एक सुनसान पटरी पर क्षत-विक्षत दो लावारिस टुकड़ों में बिखर जाता है।

6. संवादों की वैचारिक व मर्मस्पर्शी व्याख्या
फिल्म के संवादों में कोई फिल्मी मेलोड्रामा नहीं, बल्कि एक कड़वा यथार्थ और नैतिक जिम्मेदारी है:
"कहते हैं जब सूरज डूबने लगता है, तो वह दूर क्षितिज पर खड़े दीये को अपनी रोशनी सौंप जाता है। मैं तो बस एक छोटा सा दीया हूँ, जो अपने हिस्से की रोशनी फैला रहा है... मैं अँधेरों को चुनौती देता हूँ।" यह संवाद खालरा के वास्तविक भाषणों से लिया गया है। यहाँ 'अँधेरा' उस राज्य पोषित आतंक और खौफ के माहौल का प्रतीक है, जिसके खिलाफ बोलने की हिम्मत किसी में नहीं थी। यह संदेश देता है कि जब जुल्म का अंधकार घना हो, तो आपका आकार मायने नहीं रखता; मायने यह रखता है कि क्या आपमें सच की लौ जलाने का साहस है। यह सत्य की अमरता का संदेश है।
"कानून की किताब में 'लावारिस' लाशें होती हैं इंस्पेक्टर साहब, पर माँ की कोख कभी लावारिस नहीं होती।" यह संवाद व्यवस्था के उस ठंडेपन और प्रशासनिक अमानवीयता पर करारा तमाचा है, जो इंसानों को सिर्फ एक कानूनी आंकड़ा मानती थी। यह याद दिलाता है कि जिसे सिस्टम 'लावारिस' लिख रहा है, उसकी माँ आज भी दरवाजे पर उसकी राह देख रही है।
"हम यहाँ इतिहास बना रहे हैं खालरा साहब, और इतिहास गवाहों से नहीं, ताकतों से लिखा जाता है।" यह संवाद बंदूक के नशे में चूर उस क्रूर सत्ता के अहंकार को दर्शाता है जो मानवाधिकारों, कानूनों और अदालतों को तुच्छ समझती है और मानती है कि भविष्य में केवल ताकतवरों की जीत याद रखी जाएगी, बेकसूरों की चीखें नहीं।
"अगर चुप रहना ही जिंदा रहना है, तो ऐसी जिंदगी से बेहतर है कि सच बोलते हुए मर जाना।" जब खालरा का परिवार और शुभचिंतक उन्हें पुलिस की धमकियों के कारण पीछे हटने या विदेश चले जाने की मिन्नतें करते हैं, तब उनका यह जवाब उनके अटूट चरित्र को दिखाता है। उनके लिए सिर्फ सांसें लेना जीना नहीं था; जुल्म के सामने चुप रहना नैतिक रूप से मर जाने के समान है।
7. राजनीतिक विश्लेषण: असीमित शक्तियां, भ्रष्टाचार और वर्तमान बैन का कारण
फिल्म का मूल विषय यही है कि जब राज्य (State) किसी असाधारण परिस्थिति (जैसे आतंकवाद) से निपटने के लिए सुरक्षा बलों को 'असीमित शक्तियां' दे देता है, तो जवाबदेही (accountability) खत्म हो जाती है। 90 के दशक में पंजाब के कुछ भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों ने इसका इस्तेमाल अपने निजी स्वार्थ, आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन (समय से पहले तरक्की), सरकारी इनाम राशि और जबरन वसूली (extortion) के लिए किया। किसी भी निर्दोष को 'आतंकवादी' बताकर उठा लेना एक प्रशासनिक टूल बन गया था।
यह प्रवृत्ति आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। कई समाजशास्त्रियों और मानवाधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि आज भी देश के विभिन्न हिस्सों (जैसे कश्मीर, उत्तर-पूर्व या नक्सल प्रभावित क्षेत्रों) में जब सुरक्षा कानून (जैसे AFSPA या UAPA) लागू होते हैं, तो 'कस्टोडियल डेथ' या 'फर्जी एनकाउंटर' के आरोप सामने आते हैं। फासिस्ट रेजीम इसे टूल के रूप में इस्तेमाल करते हैं; गौरी लंकेश से लेकर कुलबुर्गी की हत्या तक इसके ज्वलंत प्रमाण की एक शृंखला हैं, और सुरक्षा व देशद्रोह के नाम पर हिरासत की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है।
यहाँ यह गहरा राजनीतिक विश्लेषण आवश्यक है कि जब 1990 के दशक में पंजाब और केंद्र दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी, तो वर्तमान सरकार इस फिल्म को प्रदर्शित होने से क्यों रोक रही है? इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं:
'स्टेट मशीनरी' (State Machinery) का बचाव: सत्ता भले ही बदले, लेकिन 'राज्य' का चरित्र और उसकी सुरक्षा एजेंसियां (इंटेलिजेंस, पुलिस, ब्यूरोक्रेसी) हमेशा एक जैसी रहती हैं। कोई भी केंद्र सरकार आधिकारिक रूप से यह विमर्श स्थापित नहीं होने देना चाहती कि भारत की सुरक्षा एजेंसियां अपने ही नागरिकों के संगठित नरसंहार या गैर-न्यायिक हत्याओं में शामिल थीं, क्योंकि इससे सुरक्षा बलों का मनोबल गिरता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि खराब होती है।
पंजाब की वर्तमान संवेदनशीलता: पंजाब पिछले कुछ वर्षों से किसान आंदोलनों, अमृतपाल सिंह प्रकरण और अलगाववादी भावनाओं के उभार के कारण बेहद संवेदनशील मोड़ पर है। केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों को यह अंदेशा है कि पुराने घावों को बिना किसी फिल्टर के दिखाने से युवाओं में व्यवस्था के प्रति आक्रोश दोबारा भड़क सकता है, जिसका फायदा अलगाववादी तत्व उठा सकते हैं।
राजनीतिक लाभ-नुकसान का गणित: भाजपा इस फिल्म को रोककर अपने कोर वोटर बेस के सामने खुद को "मजूद राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता" के इकलौते रक्षक के रूप में पेश करती है। हालांकि, पंजाब के धरातल पर सिख समुदाय इसे सच को दबाने और उनके इतिहास को सेंसर करने की केंद्र सरकार की तानाशाही के रूप में देख रहा है, जिससे पंजाब में भाजपा की राजनीतिक स्वीकार्यता और कठिन होती जा रही है।

8. विचारधाराओं और विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिक्रियाएं
क) वामपंथी पार्टियों का स्टैंड (CPI, CPI(M) और लिबरेशन)
वामपंथियों ने फिल्म को ZEE5 से अचानक हटाए जाने और इस पर लगे प्रतिबंध को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अपनाया है। वे इसे 'अभिव्यक्ति की आजादी पर फासीवादी हमला' और 'अघोषित सेंसरशिप' मानते हैं, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों (Article 19) का खुला उल्लंघन है। माकपा (CPI-M) के सांस्कृतिक मोर्चों का कहना है कि सरकार केवल उन्हीं फिल्मों को बढ़ावा देना चाहती है जो उनके राजनीतिक एजेंडे को सूट करती हैं (जैसे प्रोपेगैंडा फिल्में), जबकि व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले वास्तविक सिनेमा का गला घोंटा जा रहा है। वामपंथियों ने स्पष्ट किया कि 1990 के दशक में मानवाधिकारों का उल्लंघन चाहे कांग्रेस के दौर में हुआ हो या किसी और के, "ज़ुल्म तो ज़ुल्म है।" उनका कहना है कि आज की सत्ता अतीत के उस दमनकारी प्रशासनिक तंत्र को बचा रही है, जिसका इस्तेमाल वह खुद आज देश के अन्य हिस्सों में सामाजिक कार्यकर्ताओं और व्हिसलब्लोअर्स को चुप कराने के लिए करती है। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU), जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली यूनिवर्सिटी और जाधवपुर यूनिवर्सिटी (बंगाल) जैसे वामपंथी प्रभाव वाले परिसरों में छात्र संगठनों (जैसे SFI और AISA) ने फिल्म की डाउनलोड की गई प्रतियों की ओपन-एयर स्क्रीनिंग (Open Screenings) आयोजित की और नारा दिया—"तुम एक सतलुज को रोकोगे, हम हर कैंपस में सतलुज बहाएंगे।"
ख) बांग्ला मीडिया और सिनेमाई हलकों का नजरिया
बंगाल का अपना एक समृद्ध राजनीतिक सिनेमा का इतिहास रहा है (मृणाल सेन और ऋत्विक घटक के कारण), इसलिए बांग्ला मीडिया (जैसे आनंदबाजार पत्रिका, ई-समय, न्यूज़18 बांग्ला, और कलकत्ता ट्रिब्यून) ने इसे ऋत्विक घटक और मृणाल सेन के राजनीतिक सिनेमा की परंपरा से जोड़कर देखा। आनंदबाजार पत्रिका के समीक्षकों ने लिखा कि 'सतलुज' महज़ एक फिल्म नहीं, बल्कि यह लोकतंत्र के भीतर दबे एक बहुत बड़े मानवाधिकार संकट का 'दस्तावेजीकरण' है। उन्होंने दिलजीत दोसांझ के अभिनय की तुलना गहरे बंगाली यथार्थवादी किरदारों से की और उनके अभिनय में एक ठहराव और 'शांत आक्रोश' (Quiet Fury) को रेखांकित किया। उन्होंने लिखा कि 'अमर सिंह चमकीला' से 'खालरा' तक का सफर साबित करता है कि दिलजीत भारतीय सिनेमा के सबसे गंभीर और बहुमुखी अभिनेताओं में से एक बन चुके हैं। न्यूज़18 बांग्ला ने ओटीटी बैन को "शिल्पेर उपोर आघात" (कला पर प्रहार) करार देते हुए इसे स्वतंत्र निर्देशकों के लिए एक डरावना संकेत बताया और एस पी सुग्गा के अंत वाले दृश्य (रेलवे ट्रैक पर आत्महत्या) के 'काव्यात्मक न्याय' की कलात्मक सराहना की।
ग) दक्षिण भारतीय मीडिया और क्रिटिक्स का दृष्टिकोण
दक्षिण भारतीय सिनेमा का अपना एक मजबूत राजनीतिक और यथार्थवादी नैरेटिव (जैसे 'विशारनइ', 'जय भीम' या 'जन गण मन' जैसी फिल्में) रहा है, इसलिए वहां के समीक्षकों (जैसे The Hindu, Lensmen Reviews) ने इसे असाधारण संवेदनशीलता के साथ देखा। दक्षिण भारत के सबसे प्रतिष्ठित अखबार The Hindu ने अपने रिव्यू में इसे भारतीय सिनेमा का एक ऐतिहासिक मील का पत्थर और मानवाधिकारों व राज्य की क्रूरता का एक निडर और समकालीन दस्तावेज बताया। अखबार ने लिखा कि यह फिल्म पंजाब में उग्रवाद के दौरान राज्य मशीनरी द्वारा मिटाए गए हजारों नामों के लिए गाया गया एक "शांत भजन" (quiet hymn) है, जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों के लिए एक 'टाइमलेस वॉर्निंग' (अमर चेतावनी) है। Lensmen Reviews ने फिल्म के 'प्रोसीजरल ड्रामा' से 'राजनीतिक थ्रिलर' में बदलने के सिनेमाई शिल्प और कड़े सस्पेंस की जमकर तारीफ की। दक्षिण भारतीय क्रिटिक्स ने सुविंदर विक्की द्वारा निभाए गए एस पी सुग्गा के किरदार की तुलना हॉलीवुड फिल्म 'इंग्लोरियस बास्टर्ड्स' के विलेन 'हंस लांडा' से करते हुए इसे 'क्रूरता का सामान्यीकरण' (Normalisation of Terror) माना। साउथ के सिनेमाई हलकों में भी ओटीटी बैन को रचनात्मक स्वतंत्रता पर एक खतरनाक प्रहार माना गया।
घ) राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं
राष्ट्रीय मीडिया व क्रिटिक्स: India Today ने लिखा कि "जब एक लोकतंत्र अपने मृतकों को भूल जाता है, तो सिनेमा याद रखता है।" उन्होंने के.यू. मोहनन की सिनेमैटोग्राफी और दिलजीत के अभिनय की सराहना की और कहा कि फिल्म दर्शकों के भीतर एक गहरा खालीपन और दुख छोड़ जाती है। Scroll.in ने इसे "दमन और साहस की एक झकझोर देने वाली कहानी" कहा और रात के सन्नाटे में बिना रोशनी के खेतों से गुजरती पुलिस की गाड़ियों को व्यवस्था के स्याह चेहरे का सटीक प्रतीक बताया। अधिकांश यूट्यूब क्रिटिक्स और डिजिटल समीक्षकों ने इसे दिलजीत के करियर का 'मास्टरपीस' बताया है।
मुख्यधारा के डिबेट शोज़: इसके विपरीत, Times Now जैसे चैनल्स ने अपने डिबेट शोज़ (जैसे India Upfront) में फिल्म के 'सिलेक्टिव नैरेटिव' पर सवाल उठाए और तर्क दिया कि यह फिल्म पंजाब के उग्रवाद की पूरी तस्वीर नहीं दिखाती और राष्ट्रविरोधी तत्वों के प्रति सहानुभूति पैदा कर सकती है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता है। प्लेटफॉर्म ZEE5 ने अपनी आधिकारिक स्टेटमेंट में कहा कि वे 'सतलुज' और निर्देशक के विजन के साथ मजबूती से खड़े हैं और उचित कानूनी प्रक्रिया (due process) के तहत इस फिल्म को जल्द वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया: अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों (Amnesty International & Human Rights Watch) ने भारत में फिल्म को बैन किए जाने की कड़ी आलोचना की और कहा कि 'अतीत के मानवाधिकार उल्लनघनों को सेंसर करना' भारत के लोकतांत्रिक दावों पर सवाल खड़े करता है। विदेशी मीडिया (जैसे Variety और The Guardian) ने इस बात को प्रमुखता से उठाया कि कैसे भारतीय प्राधिकारियों के दबाव में इसे टोरंटो फिल्म फेस्टिवल से वापस लेना पड़ा था। कनाडाई मीडिया ने इसे 'सत्य और सेंसरशिप की वैश्विक जंग' के रूप में कवर किया है।
फिल्म बिरादरी व निर्देशक: फिल्म के हटने पर निर्देशक हनी त्रेहान ने बेहद भावुक और गरिमापूर्ण तरीके से पंजाबी में लिखा—"तेरा भाणा मीठा लागे" (ईश्वर की इच्छा ही सर्वोपरि है)। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी अलगाववादी (Khalistani) आंदोलन को बढ़ावा देना नहीं था, बल्कि कानून के शासन (Rule of Law) की रक्षा करना था। उन्होंने कहा, "मैं कड़वाहट से नहीं भरा हूँ, देश चलाने वालों की जिम्मेदारियां बहुत बड़ी होती हैं।" कई स्वतंत्र निर्देशकों ने इसे सिनेमा के इतिहास की एक बड़ी त्रासदी माना है।

'सतलुज' केवल एक ऐतिहासिक या क्षेत्रीय घटना पर बनी फिल्म नहीं है। यह लोकतंत्र, मानवाधिकार और व्यवस्था (state machinery) की जवाबदेही पर एक वैश्विक और कालातीत (timeless) सवाल उठाती है। यह देशभक्ति और राज्य की क्रूरता के बीच की महीन रेखा को रेखांकित करती है और पूछती है कि—"जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो आप अपनी शिकायत लेकर किसके पास जाएंगे?" 'सतलुज' ने यह साबित कर दिया है कि सत्ता भले ही फिल्मों पर ताले लगा सकती है, लेकिन जब कोई फिल्म पूरी ईमानदारी और अटूट प्रतिबद्धता के साथ इतिहास के सच को बयां करती है, तो वह जनता के दिलों में अपनी जगह खुद बना लेती है। जसवंत सिंह खालरा का वह छोटा सा दीया आज भारतीय सिनेमा के पर्दे पर एक मशाल बनकर जल रहा है।
और पढ़ें : हिन्दी फिल्म 'आर्टिकल 15 (2019) पर केशव भट्टड़ का समीक्षा आलेख
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